' कब तक आखिर'
-संजय विद्रोही
नवाब लेन ... चलोगे?' एक रिक्शेवाले से पूछा।
'चलेंगे बाबू ... बैठो' कहकर रिक्शेवाले ने अपने मैले-कुचैले गमछे से रिक्शे की सीट पौंछी और जोर से सीट पर हाथ मार कर बैठने का ईशारा किया। मैं एक हाथ से अपनी धोती सम्हालते हुए सावधानी से रिक्शे में बैठ गया।
रिक्शेवाले ने उसी गमछे से माथे का पसीना पौंछा और जुट गया अपने काम में। आदमी ढोने का काम। मेरे दाँये हाथ की अंगुलियों ने कँधे पर लटके थैले में रखे डब्बे को कस कर पकड़ रखा था।
मैं अजीब कौतूहल से सड़क के दोनों ओर गर्दन घुमा-घुमा कर देख रहा था। हालाँकि यह कलकत्ता मेरा बखूबी देखा भाला था। किन्तु हर बार इस शहर में एक नयापन लगता है। हर बार पहले से अधिक जीवन्त, अधिक तेज रफ्तार प्रतीत होता है।
रिक्शा मुख्य सड़क से उतर कर अब एक संकरे रास्ते पर चला जा रहा था। रास्ते में एक ओर कुछ औरतें टोकरों में मछलियाँ लिए बैठी थी। ग्राहक मछलियों के मोल भाव कर रहे थे। कुछ ग्राहक सिर्फ मछली वाली के ऑंचल में झाँक लेने की गरज से झुक कर नाहक ही मछलियों को उलट-पलट कर देख रहे थे। गंदुमी त्वचा, किन्तु गठीले बदन वाली एक पाट की धोती कमर में बैठी वो औरतें अपनी उघड़ी हुई पिंडलियों पर चिपकी, ग्राहकों की बेधती नजरों से बेखबर मछली तोलने और पैसे लेने में व्यस्त थी और ग्राहक अपने 'काम' में। मैं ये सब देखकर मुस्कुरा दिया। इतने में रिक्शा उस छोटे से मछली बाजार को पीछे छोड़कर आगे निकल चुका था।
अब मार्ग में अधिक चहल-पहल नहीं थी। रिक्शा तेज रफ्तार से चल रहा था। मैंने अब भी थैले में रखे डिब्बे को कसकर पकड़ा हुआ था। अचानक मैंने गौर किया कि ये तो वह रास्ता नहीं है जो हवेली को जाता है। 'अरे भाई इधर कहाँ लिए जा रहे हो? नवाब लेन का ये कौन सा रास्ता है? बताओ तो।' मन के विचार मुँह से निकल पड़े। 'बाबू, मेन रास्ते पर सड़क मरम्मत हो रही है सो हम आपको इधर से ले आये हैं। रास्ता लम्बा जरूर है लेकिन पहुँचेगा नवाब लेन ही। आप चिन्ता ना करें। आप हमें किराया उसी छोटे रास्ते का दे दीजिएगा।' हाँफते हुए पैड़ल मारता रिक्शाचालक बोला। हालाँकि उसके जवाब से आंशिक संतुष्टि तो हो गई थी, फिर भी एक धड़का-सा था हृदय में। 'किसी की अमानत, वो भी बेटी के ब्याह का गहना लेकर जा रहा हूँ मैं, कुछ ऊँच-नीच हो जाये तो सेठ जी की इज्जत का क्या होगा? क्या जाने रिक्शा वाले की नियत कैसी हो? मन किसने देखा है? सोच रहा था कि अपनी तसल्ली के लिए पास से गुजर रहे एक आदमी से पूछा 'सुनिए साहब, क्या नवाब लेन को यही रास्ता जायेगा।' 'जी हाँ' कहकर वह आगे बढ़ गया। रिक्शेवाले ने पलट कर देखा और अर्थपूर्वक मुस्कुरा दिया, शायद वह मेरी मनोदशा भाँप गया था। मैं स्वयं में बहुत शर्मिन्दा हुआ और सिर घुमाकर सड़क के एक ओर देखने लगा।
पिछली बार जब जमीन के कागजों पर सेठ जी के दस्तखत लेने कलकत्ता आया था तब उनके यहाँ दो व्यक्ति बैठे थे। एक तो बूढ़ा था। जिसके चेहरे पर गजब की चमक थी। सफेद धोती कमीज शरीर पर, सिर पर काली महाजनी टोपी, पाँव में चमड़े के जूते और हाथ में बेंत लिए वह, सेठजी से कोई गम्भीर चर्चा कर रहा था। बगल में एक सुदर्शन युवक बैठा था। काली पतलून सफेद कमीज, करीने से कंॅघी किये गये बाल और सीधा सादा खानदानी प्रतीत होने वाला युवक जो जमाने की हवा से अभी तक अनछुआ था। गर्दन झुकाए बेवजह अपनी अंगुलियों' की अकड़न निकाल रहा था। बीच-बीच में नजर उठाकर सामने के बरामदे में खुलने वाले कमरे के दरवाजे की ओर भी देख लेता था और तुरन्त संकोच से दृष्टि झुका लेता था। वहाँ सत्या काँधे पर ऑंचल डाले इस तरह छुप कर खड़ी बातें सुन रही थी मानो उसे कोई ना देख रहा हो। लेकिन वह युवक उसे देख रहा है, वो नहीं जानती थी। 'तो फिर तय रहा कांतिलाल जी, हमें यह सम्बन्ध मँजूर है। अब आप उस बात का ध्यान रखना। वैसे आप खुद भी खानदानी हैं, समझदार हैं।' वृध्द ने उठते हुए कहा। उधर सत्या और युवक की ऑंखें मिली तो सत्या शरमाकर ऊपर दौड़ गई। सेठजी और वह युवक भी खड़े हो गये। सेठजी ने वृध्द का हाथ अपने हाथों में लेते हुए विनम्र लहजे में कहा 'घोषाल बाबू, वैसे तो लड़की वाले कभी भी वरपक्ष की बराबरी नहीं कर सकते ... सम्भव भी नहीं है, किन्तु आपकी इज्जत का पूरा ख्याल रखने का प्रयास करूँगा।'
'अरे सेठ जी कैसी बातें करते हैं आप? सेठ कान्तिलाल के मुँह से ऐसी बातें शोभा नहीं देती। आपको रुपये पैसे की क्या कमी? आप तो कई शादियाँ एक साथ कर दें और साँस तक ना निकालें।' हँसकर घोषाल बाबू ने कहा।
'ये तो आपका बड़प्पन है। वरना, अब वो पहले वाली बात कहाँ रही है, घोषाल बाबू? हाँ, जमींदारी के वहम से पुरानी शानोशौकत जिन्दा है, बस।' एक लम्बी साँस निकल पड़ी सेठ जी के मुँह से।
'अरे जाने दीजिए साहब ... बेटा अजीत ... सेठ जी के पाँव छुओ ये तुम्हारे होने वाले ससुर हैं।' घोषाल बाबू ने बेटे के कंॅधे पर हाथ रखते हुए कहा। बेटे ने बढ़कर चरण छुए और सेठजी ने आशीर्वाद में अपने दोनों हाथ उसके सिर पर रख दिये।
उनको बाहर तक विदाकर के लौटे तो निढाल होकर सोफे पर गिर पड़े। मैं पास ही बैठा उन कागजों को छाँटकर अलग कर रहा था जिन पर सेठजी के दस्तखत लेने थे। उनको इस तरह निढाल होकर गिरते देखा तो उठ कर दौड़ पड़ा।
'क्या बात है मालिक, क्या हुआ?
''कुछ नहीं अखिलेश बाबू ... यूँ ही। ... सत्या का ब्याह करना है। ... खरीदना है लड़का ... ' कहते हुए सम्हल कर सेठ जी बैठे। मैंने बढ़कर उनकी कमर के नीचे तकिया लगा दिया।'आप चिन्ता क्यों करते हैं सेठ जी ... भगवान ने चाहा तो सत्या बेटी राजी-खुशी परायी हो जायेगी ... फिर जमींदारी तो है ... ब्याह की चिन्ता आप क्यों करते हैं?'
'अखिलेश बाबू ... आप तो असलियत जानते हैं ... फिर क्यों सब लोगों जैसी बातें करते हैं? आप जानते हैं कि उस जमींदारी के भरोसे रहा तो हो चुकी सत्या अपने घरबार की। कुछ एकड़ बंजर जमीन को आप जमींदारी कहते हैं?' सेठजी का लहजा दीन और परेशान था।
'आपने कितने ही लोगों पर अहसान कर रखे हैं। कितनों ही की लड़कियों के ब्याह में दान-दहेज दे चुके हैं। कितनों ही के लगान माफ कर चुके हैं। क्या वो सभी इस आड़े वक्त हमारे काम नहीं आयेंगें? आप तो नाहक ही चिन्तित होते हैं। हौसला रखें भगवान भला ही करेंगें।' कहकर मैं वापस मुड़कर जाने को हुआ कि लौटकर धीमे से पूछा, 'कुछ कागजों पर दस्तखत करने थे, अभी ... या बाद में?'ए 'लाओ अभी क्या और बाद क्या? अब तो सिर्फ दस्तखत करने तक ही की जमींदारी बाकी रह गई है।' मैंने चुपचाप लाकर कागज उनके सामने की मेज पर रख दिये और उन्होंने चुपचाप सभी पर अपने हस्ताक्षर कर दिये। मैं कागज समेट कर कमरे से बाहर चला गया।'सच तो है, अब कैसी जमीन और कैसी जमींदारी? बंजर जमीन और भूखे काश्तकार क्या दे पाते हैं? जिसके भरोसे बेटी ब्याहने का हौसला किया जा सके। और 'अच्छे' लड़के आजकल सस्ते कहाँ? बिना माँ की बच्ची को पालने में वैसे ही आदमी पूरा हो जाता है, उस पर उसके ब्याह की चिन्ता। सयानी बेटी को ज्यादा दिन घर बिठाया भी तो नहीं जा सकता। फरिश्ता समान आदमी हैं, सेठजी। कभी काश्तकारों, जुलाहों पर सख्ती नहीं की। जब तक पास में रुपया रहा, जरूरतमँदों को हाथ भर-भर के देते रहे और आज वही दाता खुद इस सलीके में है कि बेटी को कैसे डोली चढ़ाये? उस पर झूठी शानोशौकत के रहते सामने वालों की ना बुझने वाली भूख-प्यास, सो अलग। भगवान जो भी करे लेकिन सत्या को सही सलामत इज्जत सहित ब्याही जाने दे।' सोचता हुआ मैं अपने कमरे में आ पहुँचा। चश्मा उतारकर एक ओर रखा और धोती के छोर से पसीना पौंछते हुए चारपाई पर लेट गया। कुछ ही देर हुई थी कि सत्या कमरे में आई 'दादा ... बाऊजी बुला रहे हैं।'ए 'चलो मैं आता हूँ' मैंने उठते हुए कहा और चश्मा लेने को मेज की ओर गया। लेकिन वो अभी तक खड़ी थी। 'चलो सत्या ... क्या है, कुछ कहना है?' सुनते ही सत्या मुझसे लिपट गई और रोने लगी। 'अरे पगली रोती क्यों है? ब्याह करवाकर पराये घर तो एक दिन सभी को जाना होता है? इसमें रोने की क्या बात है? और मैं जो हूँ, बाऊजी की चिन्ता ना कर ... तू तो अपना घर बसा।' मैंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। 'दादा ... मैं ये शादी नहीं करूँगी ... ' 'क्या कहती हो सत्या ... क्यों नहीं करोगी ये शादी ... कोई और है, जिससे तुम? ... ' 'नहीं दादा ... ऐसी बात नहीं है ... लेकिन ... मैं अपनी शादी के लिए बाऊजी की इज्जत नीलाम होते नहीं देख सकती। इससे तो अच्छा होता, मैं मर जाती। कम से कम बाप की इज्जत खाक में मिलने का कारण तो ना बनती।' वो सुबकने लगी थी। 'पागल हुई है क्या ... किसने ऑंख उठायी बाऊजी की इज्जत पर? बताओ। और गृहस्थ में तेजी-मंदी तो चलती रहती है। इसके लिए तुझे रो-रोकर हलकान करने की क्या पड़ी है? पागल कहीं की' सत्या को हिचकियाँ आने लगी थी। हिचकियों के बीच जब उसने कहा, 'हवेली गिरवीं' तो सुनकर मुझे धक्का-सा लगा। 'चलो ... तुम भीतर जाओ मैं देखता हूँ। कुछ बेजा हरकत की तो मुझसे बुरा मत जानना। बाऊजी को दुख होगा।' कहता हुआ मैं तेज कदमों से बैठक की ओर बढ़ा। सत्या ऑंसू पोंछती हुई भीतर चली गई।
बैठक में सेठजी के पास दो महाजन बैठे थे। मैं चुपचाप जाकर सेठजी के पास खड़ा हो गया। सेठजी ने कलम मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा 'अखिलेश बाबू ... गवाह की जगह दस्तखत कर दीजिए' मैंने सवालिया दृष्टि उनकी ओर घुमायी तो उन्होंने धीरे से मेरा हाथ छू लिया और हौले से पहलें झुकाकर उठाली। उन ऑंखों में मजबूरी तैर रही थी। मैंने चुपचाप कागज पर हस्ताक्षर कर दिये। महाजन एक छोटी सी संदूकची वहीं छोड़कर उठ गये। मैं उन्हें बाहर तक छोड़ने गया और लौटते हुए वहीं से अपने कमरे की ओर मुड़ने लगा कि सेठजी ने आवाज दी, 'अखिलेश ... यहाँ आओ।' मैं चुपचाप उनके पास आ गया,
'हाँ' 'नाराज हो हवेली के सौदे से? ... लेकिन और कोई रास्ता नजर नहीं आया।''हम कहीं ओर से इन्तजाम कर सकते थे ण्ण् हवेली गिरवी रखने की क्या जरूरत थी?' मैंने तनिक ऊँचे स्वर में, किन्तु अपनापे के साथ कहा। 'देखो बेटा ... जो आदमी उम्र भर दोनों हाथों से देता ही रहा हो ना, उसका हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता और यकीनन फैला हुआ वो हाथ खाली ही लौटता है। क्योंकि कुछ लोग तो नजर चुरा लेते हैं और कुछ ये सोचते हैं कि इतना बड़ा रईस ... माँग रहा है? अजी जाने दीजिए मजाक की होगी। इज्जत पर परदा पड़ा रहे ... बेटी ब्याही जाये ... तो हवेली क्या चीज है ... ?' कहते हुए उनकी ऑंखों से दो ऑंसू टप्प से टपक पड़े। मेरी भी ऑंखें नम हो आयी।
संदूकची खोलकर दो तीन रुपयों के बंडल दोनों हाथों से मुझे थमाते हुए बोले, 'अखिलेश ... बेटा तुम मेरे मातहत ही नहीं हो ... सत्या के बड़े भाई भी हो। सारा इंतजाम तुम्हें ही देखना है। जो मुनासिब समझो खानदान की इज्जत को देखते हुए, सत्या के लिए गहने खरीद लाओ ... और ये बाकी के रुपये भी अपने पास रखो ... सभी कुछ तुम्हें ही करना है ... वैसे भी बाप ना रहे तो बेटा ही बहन को डोली में विदा करता है ... मुझे हुआ ना हुआ ... बराबर ही मानो।' आवाज में असीम निराशा और दुरí