कहानी: हम एक-से
रेडियो स्टेशन से रिकॉर्डिंग के बाद ऑफिस के लिए निकला था। मोड़ से देखा बस आ रही है। मैं दौड़ पड़ा। बड़ी मुश्किल से बस पकड़ पाया। बस खचाखच भरी थी। लेकिन बस को छोड़ने का अभिप्राय था, अगले एक घण्टे तक तपती दोपहर में बीच सड़क बेबस खड़े रहना और चूँकि मैं ऑफिस से छुट्टी लिए बिना रिकॉर्डिंग के लिए आया था, इसलिए भी मेरा इसी बस से जाना आवश्यक था। नाहक किसी को कुछ कहने का अवसर देने से अच्छा है, थोड़ा कष्ट सह कर टाईम से पहुँच लिया जाए। जैसे-तैसे, भीड़ में घुसा और एक जगह छत का पाइप पकड़कर खड़ा हो गया। खचाखच भरी बस में गर्मी के मारे लोगों का बुरा हाल हो रहा था।
रेडियो स्टेशन से रिकॉर्डिंग के बाद ऑफिस के लिए निकला था। मोड़ से देखा बस आ रही है। मैं दौड़ पड़ा। बड़ी मुश्किल से बस पकड़ पाया। बस खचाखच भरी थी। लेकिन बस को छोड़ने का अभिप्राय था, अगले एक घण्टे तक तपती दोपहर में बीच सड़क बेबस खड़े रहना और चूँकि मैं ऑफिस से छुट्टी लिए बिना रिकॉर्डिंग के लिए आया था, इसलिए भी मेरा इसी बस से जाना आवश्यक था। नाहक किसी को कुछ कहने का अवसर देने से अच्छा है, थोड़ा कष्ट सह कर टाईम से पहुँच लिया जाए। जैसे-तैसे, भीड़ में घुसा और एक जगह छत का पाइप पकड़कर खड़ा हो गया। खचाखच भरी बस में गर्मी के मारे लोगों का बुरा हाल हो रहा था।
मुझसे कुछ दूरी पर एक पतली-दुबली युवती, खिड़की का सहारा लिए खड़ी थी। उसके एक हाथ में पॉलिथीन का एक बैग था और दूसरे हाथ से उसने खिड़की को कसके पकड़ा हुआ था। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि वो लोगों की बीच बुरी तरह फंसकर खड़ी थी। कोई और स्थान होता तो शायद वो इस तरह नहीं खड़ी होती, परन्तु महानगरीय बस सेवाओं में सफर करना इतना कष्टकर हो गया है कि वर्जनाएँ आप से आप टूट गयी हैं और व्यक्ति अति समझौतावादी हो गया है।
मैं भीड़ में से किसी तरह बार-बार उचक कर बस से बाहर झाँक रहा था, ये देखने के लिए कि अभी और कितना दूर है ऑफिस? तभी उस पास खड़ी युवती की आवाज मेरे कानों में पड़ी 'एक्सक्यूज मी प्लीज, टाईम क्या हुआ है?' मैंने इधर-उधर देखा, ये देखने के लिए कि ये टाइम किससे पूछा गया है? सभी को अपने-अपने में व्यस्त पाकर जब मैंने उस लड़की कि तरफ देखा तो वह मेरी ओर ही प्रश्नभरी निगाह से देख रही थी। मैं अभिप्राय समझ गया और भीड़ में से कलाई को ऊपर खींच कर टाइम बताया, 'पौने दो'। उसने मुस्कुराकर 'थैंक्यू' बोल दिया। अब, मेरा ध्यान उसकी ओर गया। यूँ भी अभी ऑफिस आने में देर थी। सो मैं नजर बचा-बचा कर उसे देखने लगा। उसने पीले रंग का सलवार-सूट पहन रखा था। गले में हल्के नीले रंग का दुपट्टा पड़ा था। चेहरे पर अजब सौम्यता मिश्रित सुन्दरता थी, ऑंखें बड़ी-बड़ी और नाक नुकीला था। गेहुँआ रंग के चेहरे पर दोनों भौहों के बीच छोटी-सी काली बिन्दिया आकर्षक लग रही थी। पसीने की बारीक-बारीक बूँदों से सजा उसका चेहरा किसी ओस नहाये फूल जैसा लग रहा था। मैं 'उसी' में खोया था कि उसने मुझे इस तरह 'ताकते हुए' देख लिया। दोनों की नजरें मिली, वो मुस्कुरा दी। मैं बुरी तरह झेंप गया। 'क्या सोचती होगी? टाईम क्या पूछ लिया, लगा घूरने। बदतमीजों की तरह।' मैं पुनः बस के बाहर झाँकने लगा। लेकिन उसका आकर्षण ऐसा था कि बार-बार ध्यान दौड़कर उसी की ओर चला जाता। मैं उसे देखता तो उसको अपनी ही ओर देखता पाता, नजर मिलते ही वो मुस्कुरा देती और नजरें घुमा लेती। दो-एक बार इस तरह हुआ, तो मन से झिझक जाती रही, और हम रह-रह कर एक-दूसरे को देखने लगे।
अचानक कण्डक्टर चिल्लाया 'सैकेट्रेट ... सैकेट्रेट वाले आ जाओ।' मैं जैसे चौंक कर बोला, 'हाँ-हाँ ... रोको। बस की रफ्तार धीमी हुई और होते-होते बस रुक गई। मैं भीड़ को धकेलता हुआ बस से उतर पड़ा। उतर कर देखा तो 'वो' भी मेरे पीछे-पीछे ही उतर आई थी। मैं चकित रह गया। मैं कुछ और सोचता उससे पहले ही वो बोल पड़ी, 'आप, क्या यहीं काम करते हैं?'
'जी हाँ, इसी ऑफिस में अदना-सा मुलाजिम हूँ' मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
'तब तो आप रामगोपाल त्रिपाठी जी को जानते होंगें' उसने जरा जिज्ञासा से पूछा।
'हाँ, हाँ, त्रिपाठी जी के ऑफिस में ही तो मैं हूँ' मैंने अवगत कराया। फिर जरा रुककर पूछा 'आप त्रिपाठी जी को कैसे जानती हैं?'
'जी, वो मेरे अंकल लगते हैं।'
'लेकिन अभी तो लंच टाईम है, वो घर गये होंगें' चलते-चलते मैंने बताया।
'क्या? कितनी देर में आ जाएँगे, लगभग?' उसके स्वर में त्रिपाठी जी से नहीं मिल सकने का अफसोस साफ नजर आ रहा था।
'बस आने ही वाले होंगे' मैंने घड़ी देखते हुए कहा। दो बज कर दस मिनट हो चुके थे। त्रिपाठी जी अमूमन ढाई, पौने तीन तक आ जाते हैं।
'चलिए तब तक एक-एक कप कॉफी हो जाए' मैंने साथ ही जोड़ दिया। वो स्वीकृति में मुस्कुरा दी। हम एक चौड़े दालान को पार करके केण्टीन की ओर बढ़ गये।पहाड़ी छोकरा दो कॉफी दे गया था। धीरे-धीरे कॉफी पीते-पीते हम बातें कर रहे थे। उसने पूछा, 'मैंने आपको रेडियो स्टेशन से निकलते हुए देखा था। वहाँ कैसे?'
'कुछ नहीं, वहाँ मेरी एक रिकॉर्डिंग थी। छुट्टी लेने की बजाए, लंच-टाईम से कुछ पहले निकल गया था।' मैंने टालने के-से अंदाज में जवाब दिया।
'रिकॉर्डिंग? आप गाते हैं?' वो चकित थी।
'जी नहीं, गाता नहीं हूँ। लिखता हूँ। मेरी कविताओं की रिकॉर्डिंग थी।'
'आप लिखते हैं? कब से लिख रहे हैं?' वो अब धीरे-धीरे अनौपचारिक हो रही थी।
'यूँ ही थोड़ा-बहुत लिख लेता हूँ। पहले शौकिया लिखता था, फिर आदतन लिखने लगा और अब मजबूरन लिखता हूँ।' मैंने कॉफी का एक घूँट भरते हुए कहा। बात कहीं भीतर से निकली थी, सुनते ही 'वो' गम्भीर हो गई।
'मजबूरन क्यों?' उसने पूछा। प्रश्न में गम्भीर जिज्ञासा थी।
'क्लर्क की पगार कितनी होती है? जानती ही होंगी। उसमें घर चलाना बहुत ढेढ़ी-खीर होती है, मैडम। रेडियो स्टेशन में कुछ मिलने-जुलने वाले लोग हैं, उनके जरिये महीने-दो महीने में एक दो कार्यक्रम हो जाते हैं। थोड़ा कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन से मिल जाता है। बस गुजारा हो जाता है। इसे 'मजबूरन लिखना' नहीं कहूँ तो क्या कहूँ?' मैं हँसने की चेष्टा करने लगा। मगर मैं जानता था कि मैं विफल हो रहा हूँ। क्योंकि मेरी हँसी मेरे चेहरे के भावों से कतई मेल नहीं खा रही थी। वो अभी भी पहले जैसी गम्भीर बैठी थी।
'घर में कौन-कौन हैं?'
'बूढे माँ-बाप हैं और दो बहिनें हैं।'
'आपकी शादी ... ' उसने थोड़ा झिझकते हुए प्रश्न किया।
'जिस भाई की दो-दो जवान बहिनें घर में बैठी हों, उसकी शादी करना ना तो उचित है और ना ही आवश्यक।' वेटर कप लेने आ गया था, उसको दस का नोट थमाते हुए मैंने कहा।
'ऐसा क्यों सोचते हैं आप? ये क्यों नहीं सोचते कि माँ-पिताजी को बेटियों के जाने के बाद अकेलापन नहीं खलेगा। उनका मन बहला रहा करेगा।' इस बार वो हल्का-सा मुस्कुरायी भी।
'ये सब कहने की बातें हैं। घर में खाने वाला एक पेट और बढ़ जाएगा, ये नहीं दिखता आपको? उसके पीछे फिर और कितने खाने वाले बढते हैं, ये नहीं नजर आता? यूँ भी देश की आबादी कम नहीं है। मेरा शादी नहीं करना मेरे साथ साथ देश के हित में भी है, ये क्यों नहीं सोचती आप?' मैंने बात को मजाक में उड़ाने का प्रयास किया और इस बार सफल भी हो गया।
'आप तो ... ' वो हँस पड़ी।
'त्रिपाठी जी से क्या काम था?' मैंने तुरन्त बात का रुख मोड़ दिया।
'त्रिपाठी जी मेरे पापा के दोस्त हैं। एक ट्राँसफर कैंसिल करवाना है। उसी सिलसिले में त्रिपाठी जी से मिलना था' उसने प्रयोजन बताया। तभी मुझे दूर से त्रिपाठी जी आते हुए दिखाई दे गये। मैंने ईशारे से उसको बता दिया। वो उठकर उस और चल पड़ी। त्रिपाठी जी ने उसे गले से लगा लिया और अपने साथ लेकर अन्दर की ओर बढ़ गए। मैं उन्हें जाता हुआ देखता रहा, उसने पलट कर नहीं देखा।
कुछ देर बैठे रहने के बाद उठकर मैं भी ऑफिस की ओर बढ़ गया। वो त्रिपाठी जी के सामने वाली कुर्सी पर बैठी थी। दरवाजा खुलने की आवाज से चौंक कर दोनों का ध्यान मेरी तरफ गया। त्रिपाठी जी यथावत थे, अभ्यस्त जो थे। हाँ, वो धीरे से मुस्कुरा दी। मैं चुपचाप जाकर अपनी टेबिल पर बैठ गया और कुछ देर फाईलें इधर-उधर करने के बाद एक कागज टाईप करने लगा। हालाँकि मेरी उंगलियाँ टाईपराइटर पर चल रही थी, मगर मेरे कान उनकी बातों पर लगे हुए थे।
'अंकल, काम तो यहाँ भी करना है और वहाँ भी। बस फिक्र है तो माँ की। आजकल उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं रहती।'
'क्या भाभी जी की तबियत में कोई सुधार नहीं है?' त्रिपाठी जी चिन्तित हो उठे।
'पहले से तो बेहतर है, अंकल। लेकिन अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं है। हो भी नहीं सकती, आप तो जानते ही हैं। पता नहीं भगवान को क्या मंजूर है?' उसका स्वर उदास था।
'नहीं, बेटे। यूँ हिम्मत नहीं हारा करते। भगवान पर भरोसा रखो, सब ठीक हो जाएगा, और फिर जिस माँ की तुम जैसी बहादुर बेटी हो उसको कभी कुछ हो सकता है भला?'
'बस, ये ही वजह है अंकल। वरना काम तो काम है, जहाँ मिलेगा करना ही पड़ेगा। फिर सरकारी नौकरी में तो यूँ भी बिस्तर बाँधे रहना चाहिए। पापा को तो आप जानते ही हैं। वो और उनके मरीज बस उनकी दुनिया तो वहीं तक है। भैया अहमदाबाद के होकर रह गये हैं। उन्हें घर परिवार से शायद कुछ लेना-देना नहीं है। अनुश्का अभी छोटी है। पढ रही है, उस पर अभी से क्या जिम्मेदारी डालें। वो अपना कर लेती है, वही बहुत है। ऐसे में माँ की देखभाल करने वाला घर में कोई नहीं है, अंकल।' वो रुँआसी हो गई थी। मैंने नजर उठा कर देखा, वो रूमाल से ऑंखें पौंछ रही थी।
'बस, बस, ऐसे दिल छोटा नहीं करते। तुम तो बहुत बहादुर लड़की हो, तुम्ही यूँ भावुक हो उठोगी तो भाभी जी को कौन सम्हालेगा? बेटे, अपने दुख को छुपाकर दूसरों के दुख को भोगना ही तो सच्चा पुण्य है। मैं क्या नहीं जानता किस तरह अभिषेक शादी के बाद अलग होकर अहमदाबाद जा बसा। क्या उसका यही फर्ज बनता था, एकलौता बेटा होने के नाते? तेरे पापा, बेटे जानती हो बहुत महान हैं। वो खुद क्या दुरूखी नहीं हैं बेटे के व्यवहार से? उसने क्या इसी दिन के लिए सपने सजाये थे? अब जब सेवा करने के लिए घर में बहू होनी चाहिए, उस वक्त बेटी पर आश्रित माँ का पति कितना विवश होता है? तुम समझ सकती हो। हालाँकि रुपये पैसे की कोई परेशानी नहीं है, मगर अपनों की देखभाल भी तो कुछ माने रखती है जिन्दगी में। ऐसे में वो मरीजों को स्वस्थ करने में अपने को झौंके हुए है और खुद एक अदेखे रोग का मरीज होता जा रहा है, भीतर ही भीतर। उसके जैसा आदमी कहाँ पाओगी, बेटा?तुमको गर्व होना चाहिए अपने पापा पर, जो इतना कुछ सहने के बावजूद भी कुछ कहते नहीं हैं। बस, चुपचाप खून के घूँट पीते रहते हैं।' त्रिपाठी जी भी भावुक हो उठे थे।
'मै समझती हूँ, अंकल। पापा अपनी जगह सही हैं। तभी तो उनसे कुछ कहते नहीं बन पड़ता। उन्होंने तो मुझे ट्राँसफर कैंसिल करवाने को भी नहीं कहा। कह रहे थे कि अनुश्का देख लेगी माँ को। पर अंकल अनुश्का का अब के अन्तिम वर्ष है, बीण्एण् का। उसकी परिक्षाएँ भी सिर पर हैं। उसकी पढ़ाई में हर्ज होगा। मैं उसको इस समय पढ़ाई के अलावा कुछ नहीं करने देना चाहती।'
'मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ, बेटे। तुम जैसी समझदार और गुणी बेटी भगवान सभी को दे। तुम अपनी एप्लीकेशन दे आओ। मैं 'डिजायर' करवाकर तुम्हारा ट्रांसफर कैंसिल करवा दूँगा। बेफिक्र रहो। दो चार दिन में तुम्हें ऑर्डर पहुँच जाएँगे।' कहकर वो मेरी तरफ मुखातिब हुए। वो ऐसा ही करेंगें, मैं जानता था इसलिए मैं और अधिक ध्यान से टाईप करने लगा। 'संदीप, सुनो जरा' उन्होंने पुकारा, युवती भी घूमकर मेरी ओर देखने लगी।
मैं उठकर त्रिपाठी जी की टेबिल के पास आकर खड़ा हुआ। मेरे हाथ में नोटबुक और पेन था, 'जी, सर।' मैंने धीरे से कहा। 'संदीप, ये प्रतीक्षा है। मेरी बेटी जैसी है। नगर निगम में जूनियर इंजिनियर की पोस्ट पर है। इसका ट्राँसफर किसी कारणवश अलवर से उदयपुर कर दिया गया है। लेकिन इसकी माँ सीरियस है। सो ये उदयपुर जाने में असमर्थ है। इसके ट्रांसफर को कैंसिल करना है। इस आशय की एक एप्लीकेशन टाईप कर लाओ जल्दी से।' उन्होंने संक्षिप्त में काम समझाया।'हाँ' कहते हुए मैंने एक नजर उसको देखा और चल दिया।
थोड़ी ही देर बाद मैंने टाईप्ड़ एप्लीकेशन ला कर त्रिपाठी जी को दे दी। त्रिपाठी जी ने उस पर उसके दस्तखत कराये, कुछ 'रिमार्क' लिखा और अपने पास ही रख लिया। अब उसके चेहरे पर संतोष के भाव थे। त्रिपाठी जी ने उसको घर चलने के लिए कहा, तो उसने माँ की तबियत का हवाला देते हुए असमर्थता जता दी। त्रिपाठी जी ने अधिक जोर नहीं दिया। जाते हुए वो मेरे पास आकर रुके और बोले, 'संदीप, प्रतीक्षा को जरा बस स्टैण्ड तक छोड़ आओगे?'
'हाँ' मैंने हामी भरी।
'नहीं, कोई जरूरत नहीं है इसकी। बेवजह इनको तकलीफ होगी, अंकल'। उसने विरोध किया।
'कोई तकलीफ नहीं होगी, ये तुम्हें बिठा आएगा।' त्रिपाठी जी ने कहा।वो कुर्सी से उठ खड़ी हुई, 'थैंक्यू अंकल, थैंक्यू वैरी मच फॉर दिस प्रोम्प्ट हैल्प।' त्रिपाठी जी ने उसको सीने से लगा लिया, 'इसमें थैंक्यू की क्या बात है? नीलिमा में और तुम में कोई अन्तर है क्या? मेरे लिए तुम दोनों ही बेटियाँ हो। आराम से जाना, संदीप तुम्हें बिठा देगा। पहुँच का पत्र देना और तेरे बाप को कहना कि कभी कभार एकाध फोन कर लिया करे।' कहते कहते वो उसकी पीठ थपथपाने लगे।
बस के जाने में काफी देर थी अभी, हम एक तरफ बैंच पर बैठ गए। स्थान हालाँकि एकान्त तो नहीं था पर कम भीड़भाड़ वाला अवश्य था। मैंने बैठने के कुछ देर बाद बात शुरू की, 'आपने उस वक्त बताया क्यों नहीं कि आप नगर निगम में जूनियर इंजिनियर हैं और अपना ही ट्राँसफर कैंसिल करवाने आई हैं।'
'ये तो मैंने बताया था ना कि मैं ट्राँसफर कैंसिल करवाने आई हूँ। हाँ, जूनियर इंजिनियर हूँ और अपने ही ट्राँसफर के सिलसिले में आई हूँ, ये जरूर नहीं बताया था मैंने। सो, उससे क्या फर्क पड़ता है?' उसने मुस्कुराते हुए कहा।
'फर्क क्यों नहीं पड़ता? मैं अनजाने में ना जाने क्या-क्या बकता रहा?' मैंने अपनी हथेली को गौर से देखते हुए कहा, शायद उससे नजरें बचाकर। 'ऐसा तो कुछ आपने कहा नहीं, जिससे मैं बुरा मानूँ।' उसने ऐसे लहजे में कहा कि मैं हँस दिया। 'हाँ, कहते तो शायद बुरा मान जाती।' वो भी हँस पड़ी। कैसी निर्मल हँसी? मैं देखता रह गया।
'आपकी माँ की तबियत को क्या हुआ है?' मैंने विषय बदलते हुए पूछा तो वो एकाएक गम्भीर हो गई, बिल्कुल ठहरी हुई झील-सी। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा 'कैंसर ... ब्लड कैंसर है, मम्मी को।' मैं एकदम चौंक पड़ा, 'क्या?'
'जी हाँ, मम्मी को ब्लड़ कैंसर है।' वो बेहद शान्त थी। कौन कह सकता था कि यही लड़की कुछ देर पहले खिलखिलाकर हँस रही थी? मैं, निर्वाक्।
'पापा डॉक्टर हैं, अपने काम में व्यस्त। बड़े भैया अहमदाबाद में रहते हैं, छोटी बहिन पढ़ रही है बीण्एण् में। ऐसे में मम्मी की देखरेख के लिए मेरा वहाँ होना बहुत आवश्यक है इसीलिए त्रिपाठी अंकल से ट्राँसफर कैंसिल करवाने की रिक्वेस्ट की है।' वो मुस्कुराने की कोशिश करती हुई बोली। 'प्रतीक्षा जी, आप वाकई बहुत हिम्मत वाली हैं। हर किसी के वश का नहीं है इतना त्याग।' बरबस ही मेरे मुँह से निकल पड़ा।
'क्यों नहीं है? आप जो हैं, जीते जागते उदाहरण। जो अपने परिवार और परिवार वालों के लिए इतना कष्ट झेल रहे हैं। अपनी भावनाओं का दमन किए हुए हैं। ये क्या कम त्याग है?''मैं पुरुष हूँ, प्रतीक्षा जी। मेरी भावनाओं का होना, नहीं होना कुछ खास अर्थ नहीं रखता। आप स्त्री हैं। जीवन की विषमताओं को अकेले सहन कर पाना स्त्री के लिए कितना चुनौतीपूर्ण होता है, जानती हैं? ऐसे में इतनी पीड़ा अकेले सहना, और वो भी निरूशब्द। वन्दनीय हैं, निस्संदेह।'
'दुःख कभी स्त्री और पुरुष का भेद नहीं करता संदीप जी। मेरा दु:ख ये नहीं है कि मुझे अपनी भावनाओं की कीमत पर अपनी माँ को बचाना है, बल्कि ये है कि मेरा भाई अपनी माँ की कीमत पर अपनी भावनाओं को जिलाए है। क्या उसका कोई फर्ज नहीं था? मैं इसीलिए ही शादी-ब्याह के झंझट में नहीं पड़ना चाहती। क्योंकि, अगर मैं भी पराये घर चली गई तो मेरे माँ-बाप का क्या होगा? बस अनुश्का के हाथ पीले हो जाएँ ... यही मेरी खुशी है ... ' कहते-कहते उसका गला भर आया, ऑंखें नम हो गई।
'प्रतीक्षा ... प्रतीक्षा ... क्या हुआ? ऐसे नहीं करते। सब ठीक हो जाएगा।' मैंने उसे चुप कराने को उसके सिर पर हाथ रखा, उसने चेहरा मेरे कंधे पर टिका दिया। मैंने चुपचाप उसे अपनी बाँहों में सहेज लिया और वो अबोध बच्चे की तरह फफकने लगी। ना जाने वो कितनी देर रोती रही, मैं जड़ बना बैठा रहा।
... उसकी बस जाने वाली थी, वो खिड़की वाली सीट पर बैठी थी। मैं बाहर खड़ा था। दोनों कुछ नहीं बोल रहे थे। निरूशब्द एक-दूसरे को देख रहे थे। उसकी ऑंखों की नमी में मुझे किसी आश्वासन की चाह तैरती दिखी। मैंने मुस्कुराकर धीरे से पलकें झुकाकर उसे आश्वस्त किया, मानो कह दिया हो कि 'प्रतीक्षा मैं तुम्हारे साथ हूँ।' वो जैसे जी उठी हो। उसने दुपट्टे से ऑंखें पौंछ ली और अनुग्रह भरी निगाहों से मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी। तभी बस चल पड़ी। मैं खड़ा रह गया, बस बढ़ गई। दो हाथ हवा में एक-दूसरे की ओर हिलते रह गये।(समाप्त)



1 comment:
c/बीण्एण्/बी.ए./ ?
अमा कुछ अनु्च्छेदों में विभाजित भी कर दो, पढ़ने में आसानी होगी।
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