Tuesday, October 18, 2005

जलजला(एक नज्म)

जलजला...
गई रात,
नींद मुझसे शायद खफ़ा थी
मैं बिस्तर पे था, मुझपे लटका था पंखा
मुझे घूरता-हाँफ़ता चल रहा था,
कि जैसे मैं चलता हूँ दफ़्तर से घर को.
निगाहों के आगे वही एक मंजर
ना जाने क्यों रह-रह के आता था मुझको
कहीं जलजला गर मेरे घर भी आता...
मकां ढह के गिरता
तबाह होता कुनबा
मेरे बीवी-बच्चे
मेरे ख्वाब सच्चे
मेरी माँ की फ़ोटो ऒ' बाबा का चश्मा
वो गुल्लू की मस्ती- वो छुट्की की गुडिया
सभी कुछ को मलबा बना कर के जाता
कहीं जलजला गर मेरे घर भी आता.
मेरे ही तो जैसा था कल एक इन्सां,
जो पागल-सा मलबे में कुछ ढूँढता था
जो आँखों में आशा की एक बूँद लेकर
उन आँखों का दीपक वहाँ ढूँढता था
निहत्था, फ़कत अपने दो हाथ लेकर.
तभी कोई आकर के ये बात कहता,
' इमारत ये अब कब्रगाह हो चुकी है'
ये सुनकर दो हाथों की बोझिल कुदालें
बहुत तेज चलने लगी बेतहाशा,
उफ़नने लगी धोंकनी जैसी छाती
लगी बुझने आँखों की इकलॊती आशा
उम्मीदों की बाती.
....अगर जलजला ये मेरे घर भी आता ???
यही सोचता हूँ
यही तुम भी सोचो
यही सोचे दुनिया
.....अगर जलजला ये मेरे घर भी आता???
-संजय विद्रोही

3 comments:

Sarika Saxena said...

हकीकत को उजागर कर रही है आपकी ये नज़्म। हम सभी रोज अपने सामने हज़ारों लोगों के मरने की खबर सुनते हैं पर कभी ये नहीं सोंचते कि ऎसा हमारे साथ भी हो सकता था। आपकी ये नज़्म हम सभी को सोंचने पर मजबूर कर देती है।

संजय विद्रोही ( Dr. Sanjay Sharma) said...

सारिका,
कुछ दिनों पहले एक मंजर एसा आया नजर के सामने टीवी देखते समय ..... कि जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया...
बस ,इस तरह से ये नज्म हो गई....अपनी भावनाओं को ज्यों का त्यों लिख डाला.
नज्म आप तक पहुँची-समर्थन के लिए धन्यवाद.

Anonymous said...

जनाब संजय जी,
आदाब!
क्या कहूँ? आपने तो जैसे अपनी रूह निकाल कर रख दी है इस नज्म में. सचमुच हम ये क्यों ना सोचें कि ये हादसा गर हमारे साथ पेश आता तो....
बस , इतना सोचने भर की देर है . फ़िर कोई सरहद हम-तुम को एक होने से नहीं रोक सकती.
आपका मुल्क जिस फ़राक दिली से हमारी मदद में आगे आया है , वो आप जैसे खुदा के बन्दों की सोच का ही नतीजा है.

खुदा आपको ओर आपके खानदान को आबाद ओर खुशहाल रखे.
आपका- जफ़र मोहम्म्द