जिन्दगी के फ़ैसले हमको मुसीबत दे गए,
मॊत को फ़िर हॊसले की वॊ इजाजत दे गए.
रोशनी की बात करते थे यहाँ हर रोज जो,
आज वो ही खुद, अन्धेरों की जमानत दे गए.
दिन गुजर जाए अगर , तो रात कटना तय नहीं,
मुस्कुराकर याद की, वो एक हिरासत दे गए.
खुद भटकते रात भर ख्वाबों खयालों के लिए,
नींद जब आयी नहीं, हमको शिकायत दे गए.
आप आए पास मेरे ऒर ये क्या कर गए?
जिस्म को सहला गए, रूह को हरारत दे गए.
-संजय विद्रोही




2 comments:
बहुत अच्छे!
आपके लिखेहुए गजल में अक्सर पढ्ता हुँ बहुत अच्छा लगता है । आपका ब्लग भि बहुत अच्छा है ।
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