Wednesday, November 16, 2005

जिन्दगी के फ़ैसले हमको मुसीबत दे गए

एक गजल
जिन्दगी के फ़ैसले हमको मुसीबत दे गए,
मॊत को फ़िर हॊसले की वॊ इजाजत दे गए.

रोशनी की बात करते थे यहाँ हर रोज जो,
आज वो ही खुद, अन्धेरों की जमानत दे गए.

दिन गुजर जाए अगर , तो रात कटना तय नहीं,
मुस्कुराकर याद की, वो एक हिरासत दे गए.

खुद भटकते रात भर ख्वाबों खयालों के लिए,
नींद जब आयी नहीं, हमको शिकायत दे गए.

आप आए पास मेरे ऒर ये क्या कर गए?
जिस्म को सहला गए, रूह को हरारत दे गए.

-संजय विद्रोही

2 comments:

Dharni said...

बहुत अच्छे!

Anonymous said...

आपके लिखेहुए गजल में अक्सर पढ्ता हुँ बहुत अच्छा लगता है । आपका ब्लग भि बहुत अच्छा है ।