Thursday, March 30, 2006

अप्रॆल माह की कहानी: इन्वेस्टमेण्ट


इन्वेस्टमेण्ट
(ताजा कहानी संग्रह "कभी यूँ भी तो हो" से)

उसने छूटते ही सबसे पहले सिगरेट ऑफर की। मैंने सहज भाव से ले ली। मुझे नहीं मालूम था कि उसको मुझसे क्या काम था, पर ये मैं जरूर जानता था कि बगैर किसी ठोस वजह के पारीक ढाई रुपये की विल्स सिगरेट जाया नहीं करेगा। मैं अभी सोच ही रहा था कि उसने पान खाने की पेशकश भी कर डाली और बगैर मेरा जवाब सुने ही, पनवाड़ी को आर्डर दे डाला 'दो सादा टुकडे, एक में चार सौ बीस।' पनवाड़ी अपने कार्य में लग गया। पारीक उसके खोखे पर टेक लगा कर कश खींचने लगा, मैं भी बेन्याज-सा धुँआ का कपास कातने लगा। दोपहर का ढ़ाई बजा होगा, दूर मरुधर एक्सप्रेस की चिंघाडनें की आवाज से पता लगा। घडी देखी, दौ पैंतीस।
'उप्रेती, एक बात बता। तू कितना इन्वेस्ट कर देता है साल में?' पारीक ने धुँआ छोडते हुए प्रश्न किया।
'जो भी थोड़ा बहुत हो पाता है, कर देता हूँ।' मैंने औपचारिक-सा जवाब दिया।
'नहीं एक्जेक्ट फीगर बता। भई डिसाईड़ तो करता होगा ना कि अबके इतना करना है या उतना' वो बड़ा स्पेसिफिक था। मैं थोड़ा सजग हो उठा। इस बीच पान वाले ने बीड़े थमा दिये थे और कहने की जरूरत नहीं है कि छ: रुपये का भुगतान भी फरागदिली से पारीक ने ही किया था। दुबारा मुझे अचरज हुआ। हम साथ-साथ फुटपाथ पर टहलते हुए आगे बढ़ने लगे।'बता' उसने रिमांईड करवाया।
'यही कोई तीस-चालीस की एनएससी ले लेता हूँ। दस पन्द्रह पीपीएफ में डाल देता हूँ। बाकी तीन चार हजार एलआईसी का प्रीमियम चला जाता है।' मैंने अपना कच्चा चिट्ठा उसके सामने खोल ड़ाला।
'हूँ' उसने पान को चिगलते हुए एक ओर से दूसरी ओर कर लिया।'मुझको देख। मैं कुछ इन्वेस्ट नहीं करता। इन्वेस्टमेण्ट करने से मिलता क्या है? पैसा और ब्लॉक हो जाता है।' उसने बड़ा भारी रहस्य मेरे सम्मुख खोल दिया हो, एसी उसकी मुखाकृति थी। अंतिम वाक्य कहते हुए उसने एक ऑंख भी दबा दी थी।
'क्या करें? टैक्स तो बचाना ही पड़ता है।'
'मैं तो पूरा टैक्स कटवा लेता हूँ। मैंने तो अकाउण्ट अफसर को कह रखा है। हाथ की हाथ काट लिया कर भई।' पारीक उत्साह में था।
'लेकिन एक लिहाज से तो ठीक ही है इन्वेस्ट करना। भविष्य के लिए सेविंग हो जाती है।'
'क्या खाक सेविंग हो जाती है? तुम्हारे पैसे पर बैंकें चल रही हैं और तुम घर में एक वक्त सब्जी बनाकर सेविंग करने में जुटे हो।' वो मुस्कुराया था।
'तुम क्या करते हो?' मेरी जिज्ञासा जागृत हो गई थी।
'जरूरतमंद लोगों की मदद करता हूँ, बस।'
'नि:शुल्क?' मुझे विश्वास नहीं हो रहा था।
'नि:शुल्क जैसा ही समझ लो।'
'कैसे?'
'डेढ रुपये सैकड़ा ब्याज लेता हूँ, और क्या?'
'ये कम थोडे ही होता है, यार।'
'आड़े वक्त रकम खड़ी मिल जाती है, सो कम है क्या? फिर डेढ रुपया सैकड़ा होता भी क्या है? पूरा दो भी नहीं होता।'
'फिर भी।' मैं अब भी विस्मित था।
'लेकिन कई बार दोस्त लोगों की मदद करते करते खुद बिल्कुल खाली हो जाता हूँ। तब अपना कोई काम आन पड़े तो इंतजाम करते नहीं बनता ...' एकाएक वो चिन्तामग्न हो गया।
'क्या हुआ?' मैंने सौजन्यतावश पूछा। आखिर सिगरेट का धुंआ और पान का स्वाद अभी ताजा जो ठहरा।
'बीबी को माइग्रेन की बीमारी है। डाक्टर को दिखाया था, उसने दो तीन मँहगे टेस्ट लिख दिए हैं। ... अपनी जेब अभी खाली चल रही है ...' उसने समस्या बतायी।
'अब क्या करेगा?'
'कुछ नहीं। यार दोस्तों से उधार लूँगा, और क्या? तुम्हारे पास कितना होगा अभी अकाउन्ट में?' वह तुरन्त अपने मंतव्य पर आ गया। सिगरेट और पान अकारथ थोड़े ही खिलाये जाते हैं।
'कुछ नहीं। मेरे पास तो अभी ज्यादा कुछ नहीं है।' मैंने अपने मनोभावों को छुपाते हुए कहा।
'फिर भी। कितना होगा?' उसका आग्रह प्रबल था।
'ये ही कोई दस बारह हजार होगा। बच्चों की फीस, बीमा पालिसियों का प्रीमियम आदि के लिए रख छोड़ा है।' मैंने बेमन से बताया।
'एक काम कर दस हजार मुझे दे दे। डेढ़ रुपये सैकड़ा पर लूंगा, देख। यारी दोस्ती अपनी जगह है, पर व्यवहार का मैं बड़ा पक्का हूँ। तुमसे दोस्ती है, इसका मतलब ये थोडे ही है कि तेरा ब्याज मार दूँ। नहीं, कतई नहीं ...' बड़े अपने पन के साथ उसने मुझे उकसाया।
'नहीं नहीं, ब्याज की कोई बात नहीं है। बच्चों की फीस देनी है, बस।'
'फीस अगले हफ्ते दे देना यार। मुझे तो सिर्फ तीन दिन के लिए ये रुपया चाहिए। उसके बाद तो मेरा इंतजाम हो जाएगा। और हाँ, ब्याज मैं पूरे महीने का दूँगा, देख। ये कायदा है, साहूकारी का।' उसने जैसे अपनी पूरी प्लानिंग मुझ पर जाहिर कर दी हो, ऑंखें फैलाकर बोला।'आज तो चार तारीख ही हुई है। पन्द्रह तक फीस जमा करानी होती है। बैठे बिठाये कुछ हाथ में आता है तो क्या बुरा है? सुनिता तो यूँ ही समय से पूर्व फीस जमा कराने की जल्दी में रहती है ...। रही बीमा प्रिमियम की बात, उसमें एक महीने का मार्जिन होता ही है ...।' मैंने मन ही मन गणित बैठायी।
'बता जल्दी' पारीक जल्दी में था।
'कब लौटाएगा?' मैं मानसिक रूप से तैयार होता जा रहा था।'तीन दिन बाद।''पक्का?' मैं पक्का ठहरा लेना चाहता था।
'तीन से चौथा नहीं होगा।'
'देख ले?'
'कसम से, यार। फिर तुमको तो बैठे बिठाये डेढ सौ रूपये ब्याज के मिल रहे हैं। क्यों घबराता है? ये भी तो एक इन्वेस्टमेण्ट ही है।' पारीक तेजी से हँस पड़ा। मैं भी मुस्कुरा दिया।मुझे भी लगने लगा था कि बेकार ही बीमा, पीएफ, किसान विकास पत्र आदि में पैसा लगाता रहा अब तक। इस तरह की स्कीमों में पैसा लगाना कहाँ की बुध्दिमानी है? पैसे को ब्लॉक कर देना है, बस। क्या मिलता है आजकल इन स्कीमों में?... आज उस बात को तीन महीने से ज्यादा हो चुका है। पारीक के तीन दिन अब तक पूरे नहीं हुए...।(समाप्त)

1 comment:

Pratyaksha said...

अच्छी लगी कहानी