दो ताजा गजलें
(१)
ये नींदों में चलने वाले,
आगे नहीं निकलने वाले.
सूरत क्या, अब आईने भी,
होंगे रूप बदलने वाले.
सपने जाने कब आएँगे,
छत पर रोज टहलने वाले.
आँख दिखाएँगे हम ही को,
खॆरातों पर पलने वाले.
हमको कॊन सम्हाल सका हॆ,
हम हॆं स्वयं सम्हलने वाले.
(२)
अपने जख्मों की आब रख लेना,
कोई इन पर नकाब रख लेना.
हो भी सकता हॆ जानलेवा वो-
अपने गम का हिसाब रख लेना.
फ़िर ना उठ आए कल तलब उसकी,
एहतियातन शराब रख लेना.
मजहबों में खुदई यकसां हॆ,
चाहे जो भी किताब रख लेना.
वो ना मालूम कब चला आए,
कोई लिखकर जवाब रख लेना.
उसके पहलू में पुँछ ना जाए कहीं,
चुटकी भर तुम हिजाब रख लेना.
वो भी लॊटेगा एक दिन 'संजय',
तुम भी अपना शबाब रख लेना.
-संजय विद्रोही



2 comments:
"सूरत क्या, अब आईने भी,
होंगे रूप बदलने वाले.",,,,,
बहुत बढिया है...सुंदर गज़लें हैं.
समीर लाल
मेरी टिप्पणी यहाँ देखें।
और, मात्राओं की कुछ गड़बड़ हो रही है। (कॊन -> कौन, हॆ -> है)
हमको कॊन सम्हाल सका हॆ,
हम हॆं स्वयं सम्हलने वाले
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