
एक गजल
मजहबों पर से संगीनों को हटालो यारो,
दस्तियाँ अपनी मंदिरों में बिछालो यारो.
दस्तियाँ अपनी मंदिरों में बिछालो यारो.
आस्तीनों के सांप ,देखना हॆ क्या देंगे
तुम कलेजे से लगा दूध पिला लो यारो.
उसकी छोटी बडी हर चीज नुमांया कर दो,
पर किताबों में दबा फ़ूल छुपालो यारो.
जिन्दगी के गमों को दर-ब-दर कॆसे कर दूँ,
मॆंने पाला हॆ जिन्हें प्यार से सालों , यारो.
आपको मछलियों से प्यार अगर ज्यादा हॆ,
तो समन्दर से मगरमच्छ हटालो यारो.
आजकल मुल्क में झगडों के कई मुद्दे हॆं,
तुम भी एक मामला संसद में उछालो यारो.
-संजय विद्रोही



3 comments:
बहुत सुन्दर,मेरा इन्तज़ार सफल हुया ।
बहुत बढिया, संजय भाई.
समीर लाल
क्या फ़ोटो है।
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