एक गजल
मन को पिछले सिरे से टटोले हॆ याद,
एक एक पल में बरसों का बोले हॆ याद.
जो भी अगले सफ़र की करे आरजू,
उसके पिछले तजुर्बों को तोले हॆ याद.
एक बिछडन का पल आँख नम कर गया,
तेरी आँखों के काजल को घोले हॆ याद.
तुम किसी एसी शब को मेरे घर रूको,
जबकि तन्हाई में मुझको खोले हॆ याद.
हॆ कोई, जो किसी कील पर बाँध दे,
सारे घर में शबोरोज डोले हॆ याद.
-संजय विद्रोही



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जो भी अगले सफ़र की करे आरजू,
उसके पिछले तजुर्बों को तोले हॆ याद.
एक बिछडन का पल आँख नम कर गया,
तेरी आँखों के काजल को घोले हॆ याद.
लुत्फ आ गया इन शेरों को पढ़ कर! बहुत खूब
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