तनु-मनु के लिए...... तुम मेरी आँखों के पहले सपन तुम मेरे सपनों के उजले नयन. तुम मेरी आशा के विश्वास हो तुम मेरे विश्वास की आस हो. तुम से सुवासित ये धरती गगन तुम ही हो श्वासों में बहती पवन.
संजय विद्रोही नाम मैंने खुद रखा.विद्रोह मेरे स्वभाव में है.समाज से विद्रोह, व्यवस्था से विद्रोह, खुद से विद्रोह. समाज ऒर परिवार के अनुभव इस विद्रोह को निरन्तर धार देते रहे हैं.घर वालों का दिया नाम संजय शर्मा चलते चलते डा. संजय शर्मा हो गया ऒर भीड में कहीं
खो गया.जीविकोपार्जन के लिए एक कालेज में रसायन-शास्त्र पढाता हूँ , परिवार चला रहा हूँ.
पत्रकार बनना चाहता था,अध्यापक हो गया. कवि-सम्मेलनों में गजलें पढने लगा, तो पत्र- पत्रिकाऒं में कहानियाँ छपने लगी. जब महफिलों में शायर की तरह तार्रूफ होने लगा, तो रसायन-शास्त्र की दो पुस्तकें आ गई.कुछ एसा ही सिलसिला अब तक जारी है......
घर में एक प्यारी-सी बीवी ऒर दो गॊलू- मोलू से बच्चे हैं.जिन को देखकर जीते रहने के बहाने मिलते रहते हैं.
.....मेरा इतना-सा जीवन है.
प्रकाशित पुस्तकें: बक्खड,गोदनामा, कभी यूँ भी तो हो(हिन्दी कहानी संग्रह), टळकतॆ पाणी री लीक (राजस्थानी कविता) तथा रसायन शास्त्र की चार पाठ्यपुस्तकें.
किसी ने बहुत ठीक कहा था कि ," हम सायादार पेड जमाने के काम आए, जब सूखने लगे तो जलाने के काम आए"... जीवन की कितनी बडी सच्चाई छिपा रखी हॆ इन पंक्तियों ने..... मेरी भी बस इतनी सी इच्छा हॆ.
2 comments:
कविता और तस्वीर दोनों ही बहुत सुन्दर बन पड़े हैं।
सुन्दर हैै आपका विश्वास,उसकी आस और मन्द बहती पवन। दुआ है यह सब सलामत रहें ।
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