Monday, September 19, 2005

जितने गहरे रिश्ते होंगे....


(१)
जितने गहरे रिश्ते होंगे,
उतने ज्यादा रिसते होंगे.

उस बस्ती में बुत मँहगे हैं,
तय है इन्सां सस्ते होंगे.

पीढी-दर-पीढी काँधों पर,
वही पुराने बस्ते होंगे.

मेरे-तेरे सम्बन्धों पर,
दुनिया वाले हँसते होंगे.

पंछी दो दानों की खातिर,
नित जालों में फ़ँसते होंगे.

(२)
जीने को हैं बहुत जरूरी,
आधे सपने, नींदें पूरी.

चाहा जिसको उसे ना पाया,
साध हमारी रही अधूरी.

सपने कैसे सच हो पाते?
किस्मत की थी नामंजूरी.

आहें देखी, आँसू देखे;
किसने देखी है मजबूरी?

जिस्मों-जिस्मों मिलना देखा,
रूहों-रूहों देखी दूरी.
-संजय विद्रोही

4 comments:

Sarika Saxena said...

दोनों ही गज़लें बहुत खूबसूरत हैं।

इंद्र अवस्थी said...

bahut sundar!

अनुनाद सिंह said...

वाह भाई , वाह ! कविता बहुत अच्छी लगी ।

Pratyaksha said...

बहुत अच्छे !
प्रत्यक्षा