आँसू की जो धार है,
गम की पैदावार है.
तन की सेहत चाहेगा,
जो मन से बीमार है.
कर दे आगे जनता को,
ये अन्तिम हथियार है.
चाहे जिस मजहब का लो,
हर बैनर तैयार है.
चाँद खिला मेरी छत पर,
रात बहुत लाचार है.
चलन हुआ है कर्फ़्यू का,
सूना हर त्योहार है.
उसको मत कुछ कह देना,
वो बेहद बेजार है.
'रस्म' जिसे तुम कहते हो,
बेटे का ब्योपार है.
मेरी आँखों पर तेरे,
सपनों का अधिकार है.
सेंध लगाए बैठा जो-
घर का चॊकीदार है.
-संजय विद्रोही



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