गजल-१भरे नहीं हैं घाव पुराने,
जारी हैं पथराव पुराने.
बेटा जब से हुआ 'कमाऊ',
मर गए माँ के चाव पुराने.
अपनी अपनी नस्ल का रोना,
पीढी के टकराव पुराने.
जिस दिन बाजी हारी हमने,
याद आए सब दाव पुराने.
बाहर से अपने दिखते हैं,
मन में हैं अलगाव पुराने.
कैसे कोई राह तलाशूँ?
इतने हैं बिखराव पुराने.
तेरा दुख, मेरा दुख यक-सां,
शब्द नये हैं, भाव पुराने.
गजल-२
दर्द फ़नां हो जाने तक,
जागेगा, सो जाने तक.
लॊट गई हर दफ़ा बहार,
आ कर मुझ वीराने तक.
मैं क्या, मेरी चाहत क्या?
बस ऒकात फ़साने तक.
जार- जार मैं रोऊँगा,
तुझको यार हँसाने तक.
छलकी आँखें देख तेरी,
शर्माए पैमाने तक.
मुझको मत बेवफ़ा बता,
अपनी वफ़ा जताने तक.
मॊत पे अपनी रोएँगे,
अपने क्या, बेगाने तक.
-संजय विद्रोही



2 comments:
भइया संजय ,विद्रोही नाम सार्थक करने के लिये इतने घाव कर ले रहे हो अपने? घाव भले तुम्हारे हों दर्द हमें होता है। बहुत जोर का।सच्ची में।
मौत पे अपनी रोयेंगे ,
अपने क्या बेगाने तक
पढ़ के लगते है कि अभी कोई रोने वाला नहीं है आपके लिये तथा संवेदनायें मिलने के लिये मरने के अलावा कोई चारा नहीं है। अइसा न करो भइया जब मरने की बातें करते हो तो दिल बैठने लगता है। इतनी खूबसूरत शक्ल/कलम के मालिक कुछ अच्छा भी देखें दुनिया में।खूबसूरत भी बहुत कुछ है यहां। बस एक बार मुस्करा दो।
संजय जी आप की पहली गजल ने मन को छू लिया. विषेशकर "अंदर से अलगाव पुराने" वाली बात ने.
धन्यवाद. सुनील
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