प्रीतम की बात चली
स्वप्न जगा झूम उठा,
अभिलाषा महक उठी
रोम-रोम पुलक उठा.
स्वप्न जगा झूम उठा,
अभिलाषा महक उठी
रोम-रोम पुलक उठा.
कजरारे नयनों में
मोती एक चमक उठा.
मोती एक चमक उठा.
आँखों की भाषा ना
चेहरे पे पढे कोई,
पैरों की पायल का
मतलब ना गढे कोई.
मिलने को साजन से हिया मेरा कूक उठा. दीप जगा झूम उठा...
चेहरे पे पढे कोई,
पैरों की पायल का
मतलब ना गढे कोई.
मिलने को साजन से हिया मेरा कूक उठा. दीप जगा झूम उठा...
पुरवाई देख सखी!
लट मेरी छेड गई,
पलकों के दो कपाट
धीरे-से भेड गई.
हाथों में गमक गया
मेंहदी का नूप-रूप,
चेहरे पे चमक उठी
लाज भरी एक धूप.
पल्लू भी सरक गया हिया मेरा कूक उठा. दीप जगा झूम उठा....
होठों पे स्मित की
हल्की-सी एक रेख,
मन के उल्लासों को
समझ गए सब देख.
जीवन की बेल नेक झूम गई-झूल गई
प्रीतम की आँखों में स्वप्न नया झूल उठा. दीप जगा झूम उठा...
-संजय विद्रोही



2 comments:
बहुत ही सुन्दर गीत है। लय और शब्द दोनों ही सुन्दर हैं।
वाह भाई क्या बात है- मान गये आपको - बहुत ही सुन्दर बन पड़ा है यह गीत!
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