Thursday, July 14, 2005

बिटिया जब घर से चली...

जीवन में आए गए जाने कितने क्लेश,
तन की होली हो चुकी, मन की होली शेष.
'उनके' आने की खबर का है रंग अनूप,
अबके लगता है सखी! फागुन लॊटा देस.
किरच-किरच चुभती रही आँखें लहुलुहान,
पलकों के भीतर धरे सपनों के अवशेष.
कभी जर्द हो कर गिरे, कभी हुए बेजान
जीवन भर सहते रहे मॊसम के आदेश.
बिटिया जब घर से चली कर के पीले हाथ,
बाबुल के घर का गया, सारा रंग 'बिदेस'.
अखबारों से आजकल गुम हैं कई सवाल,
विग्यापन की भीड में, खबरों के अवशेष.
हरे रंग के नोट का कितना गहरा रंग,
'झूठ' जमानत पर रिहा, 'सच' बेचारा पेश.
मजबूरी में पी गए अपमानों के घूँट,
सुर्ख हुई आँखें मगर, रंज ना आया लेश.
पाँच बरस के बाद फिर भरा देश में 'स्वांग',
कई सियारों ने रंगे अपने अपने भेष.
-संजय विद्रोही

5 comments:

Sarika Saxena said...

अर्थ से भरे दोहे हैं!
आपकी प्रतिभा के हम कायल होते जा रहे हैं।

संजय विद्रोही ( Dr. Sanjay Sharma) said...

सारिका जी

ये सब आपके ही निर्देशन से सम्भव हो सक है....आभार.

अनूप शुक्ल said...

स्वागत हिंदी चिट्ठाकारी शुरु करने पर। शुभकामनायें निरन्तर बढ़िया लिखने के लिये।

इंद्र अवस्थी said...

bahut badhiya

Anonymous said...

u r the best


all the best

harpreet