Wednesday, July 20, 2005

....रेत पर हादसा


चैन भी आ गया , नींद भी आ गई
आप आए यहाँ, जिन्दगी आ गई.
किस कदर है सितम ख्वाब पर नींद का,
ख्वाब आने लगे, नींद भी आ गई.
छोड के जब चला आपसी रंजीशें,
सामने हर दफ़ा दोस्ती आ गई.
हम अकेले हुए, याद आने लगी
जब अँधेरा हुआ, रोशनी आ गई.
आँधियों ने लिखा रेत पर हादसा,
दिल जलाने वहीं धूप भी आ गई.
-संजय विद्रोही

5 comments:

Nitin Bagla said...

प्रिय संजय सर
पता नही, आप को याद होगा या नही, मैं ietalwar में आपका छात्र रह चुका हूँ...फिर से सम्पर्क में आकर प्रसन्नता हुई..

Anonymous said...

संजय विद्रोही जी
आपका ब्लाग देखकर अच्छा लगा। विशेषकर आपके दोहे प्रभावशाली हैं। क्या गीत या नवगीत भी लिखते हैं? डॉ॰ व्योम

Anonymous said...

संजय विद्रोही जी
आपका ब्लाग देखकर अच्छा लगा। विशेषकर आपके दोहे प्रभावशाली हैं। क्या गीत या नवगीत भी लिखते हैं? डॉ॰ व्योम
www.hindisahitya.blogspot.com

Prem Piyush said...

संजय जी,

कहीं प्रेम का एक कुटीर खुला था,
बाहर हलकी एक आहट फिर आई ।

जिन बयारों के लिए पलकें बिछाई थी ,
उसने,विद्रोही मन,एक आशादीप जलायी ।

आपका अपना ,
प्रेम ।

deepa joshi said...

sanjay tumko jitna parti hu..utna hi impress hoti hu...u really write very well