Monday, July 25, 2005

तीन नई गजलें.......


(1)
जब भी गिरता है नीर आँखों से,
झरने लगती है पीर आँखों से.
उसके झोले में चाँद सूरज हैं,
वो, जो दिखता फ़कीर आँखों से.
खींच देगा वो आज सीने पर,
पीर की एक लकीर आँखों से.
फ़िर ना जाने, गई कितनी जानें
उसने छोडे जो तीर आँखों से.
पंखुरी लब की चूमने निकली,
ओस भी बे-नजीर आँखों से.
(2)
पीर है, प्यार है, जमाना है
ऒर हम हैं, हमें निभाना है.
आँधियों को सहेज भी लेता,
नीड लेकिन मुझे बनाना है.
रात भर करवटें बदलता हूँ,
नींद है, या कि छ्टपटाना है.
तू ना मेरी तरह परेशां हो,
तू, ना मेरी तरह दिवाना है.
चुप हुई रूह इस तरह अपनी,
जिस्म जैसे कि कैदखाना है.
(३)
अपनी ही गल्तियों से, उछ्ले मेरे फ़साने
लोगों ने बहुत रोका, हम थे कि हम ना माने.

उनकी सियासतों ने कितना दिया वतन को,
आबाद कब्रगाहें, रोशन यतीमखाने.

बस इस तरह से बीते है जिन्दगी हमारी,
साँसों का कर्ज, आहों से हम लगे चुकाने.

मिलके जो उनसे लोटे, ये हाल था हमारा
ना होश थे ठिकाने, ना हम रहे ठिकाने.

पतझर, बसंत, फ़ागुन, बारिश, बहार, सरदी
सूरत बदल के मोसम, आते रहे लुभाने.

जिस भी तरफ़ गए हम, टूटा है दिल हमारा
कोई कभी तो आए, 'मजलूम' को बचाने.
-संजय विद्रोही

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