Wednesday, July 13, 2005

आईने में उतार कर देखा....

आईने में उतार कर देखा,
मैंने खुद को पुकार कर देखा.
फ़िर ना आया नजर हमें कुछ भी,
उससे आँखें ,जो चार कर देखा.
अपने चेहरे की असलियत जानी,
जब मुखोटा उतार कर देखा.
फ़ूल-सा खिल उठा है सीने में,
जख्म दिल का संवार कर देखा.
अपनी किस्मत पे नाज होता है,
उसको जब भी निहार कर देखा.
कुछ हुआ ओर भी गहरा रिश्ता,
हमने जब भी नकार कर देखा.
-संजय विद्रोही

1 comment:

Sarika Saxena said...

बहुत ही खूबसूरत गज़ल है!
--सारिका