Wednesday, August 10, 2005

इस माह की कहानी:स्कार्फ़


स्कार्फ़
-संजय विद्रोही
मित्रों, आपके आदेशानुसार "एक कहानी हर माह" में इस महिने कहानी "स्कार्फ़" लेकर आपके बीच हूँ. तीन किस्तों में समाप्य इस कहानी की पहली किस्त आज आपको चुका रहा हूँ. अगली किस्त भी समय से चुकाने का यत्न करूँगा............
आपके स्नेह ऒर प्रतिक्रियाओं की प्रतिक्षा मे...मैं.
" बाजार तो जाने को धर्म ही ना रह्यो, आजकल तो. इतनो ट्रेफ़िक, इतनो धुँआ ऒर इतनो शोर. बाप रे बाप. इससे तो अपनो घर ही भलो. पर, बगैर जाय सरतो भी तो ना है.गली वालो बनियो,एक रुपय्या की चीज के सवा रुपय्या ले लेवे है मरो. बजार में ये तो है कि रिपिया की चीज रिपिया में मिल जावै है. गिरस्ती में इन सब बातन को भी तो ख्याल करनो पडे है लाली." विमला मॊसी साडी के पल्लू से पसीने पॊंछती हुई बोले जा रही थी..
"हाँ, सो तो है." मैंने छोटा-सा उत्तर देकर निजात पा ली. रिक्शेवाला हम दोनों की बातों से बे-खबर अपने काम में लगा था.
" तुम्हारी कसम लाली, ना ना करते पाँच हजार को तो राशन आ ही जातो है घर में महिना पै.अब तुम ही कहो, दूध ना पीयें, या घी ना खायें. साग सब्जिन कू भी मरिन कू आग लगि पडी है.कोई सब्जी दस रिपिया पाव से कम है ही ना मण्डी में.तुम्हारे अंकल कहेंगे,दाल बनाओ. तो दाल क्या मुफ़्त में आवै है? वाके भाव भी तो आसमान पै हैं."
" हाँ मॊसी,सो तो है."
" अब तुम ही कहो शक्कर कितनी मंहगी है आजकल? ऒर तुम्हारे अंकल की आदत तो तुम जानो ही हो, कित्ती खराब है? ना जाने कहाँ कहाँ से यार-भायले पकड के ले आवें हैं चाय पीने कूं? दिन भर गैस पे पतीली चढी रहे घर में. जिस पर यूं ऒर कहें मुझ से,कि तू खरचा जादा करती है.तुम ही बताओ शक्कर क्या मेरे पीहर से लाऊँ?" मॊसी ने होठों में भर आए थूक को हाथ से पॊंछ्ते हुए मन की व्यथा कह सुनाई.लाल बत्ती हो गई थी. सारे ट्रेफ़िक के साथ हमारा रिक्शा भी रुक गया था. मैं भी सोच रही थी कि आज विमला मॊसी के साथ बुरी फ़ंसी.मम्मी से मिलने आई थी. जाने लगी तो बीच ही में इन्होंने पकड लिया " चल लाली, नेक बजार चली चल मेरे संग" ओर मैं मना नहीं कर पाई. बाजार में जिस भी दुकान पर गई,उल्टा सीधा कहसुन कर उठी मॊसी ऒर नाहक माफ़ी मांगते-मांगते थक गई मैं.....
.....अचानक एक मोटर बाईक तेजी से हमारे रिक्शे के ऎन बगल में आकर झटके से रुकी. बाईक पर एक लडका ऒर एक लडकी बैठे थे. लडकी, लडके से बिल्कुल सटकर बैठी थी. बाईक के रुकते ही पीछे बैठी हुई लडकी पूरी की पूरी , बाईक चला रहे लडके पर आ पडी. लडकी ने पीले रंग की पटियाला सलवार कमीज वाला शोर्ट-सूट पहन रखा था ऒर गले में मैचिंग का दुपट्टा डाले थी. चेहरे पर उसने हरे रंग का स्कार्फ़ इस तरह से लपेट रखा था कि वो धूप से बचने के लिए कम , पहचान छुपाने के लिए लपेटा गया ज्यादा प्रतीत हो रहा था. आँखों के अलावा चेहरा जरा भी नहीं दिख रहा था. मॊसी ने उनकी ओर घूर कर देखा तो लडकी थोडा सकुचा कर संभलकर बैठ गई. मॊसी धीरे से मेरे कान में फ़ुसफ़ुसाई," देख लाली, लडकिन कैसा कैसा चरितर करें हैं आजकल?मुँह पर फ़ेंटो बाँध लेवैं हैं, जा मारे कि कोई पहचान ना ले मिलने वालो ऒर छोरा के साथ फ़टफ़टिया पर चिपक चिपक के बैठे हैं. बता का गिरस्ती बसायेंगी ये आगले घर जाकर? सबकछु तो ये अभी ही कर लेंगी, बाद में तो निरी फ़ोर्मल्टी रह जाएगी ब्याह के बाद. देख, मरी कैसी बैठी है भिडके?" मैंने भी देखा, वाकई लडकी बाईक पर लडके से चिपक कर बैठी थी. किन्तु अब थोडा सलीके से थी. थोडा असहज भी. शायद वो समझ गई थी कि हम उसी की बात कर रहे हैं. इतने में ही हरी बत्ती हो गई ऒर वो फ़र्रररर...से निकल गए. हमारा रिक्शा भी सरकने लगा.........
(क्रमश:)

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