Tuesday, August 16, 2005
इस माह की कहानी:स्कार्फ़-२
स्कार्फ़
गतांक से आगे.........
" याने जैसो सूट पहन रखो ना, एसो को एसो हमारी सीला के पास भी है. आजकल फ़ैसन है, इनको. पटियाला सलवार ऒर सोर्ट सूट कहें हैं इन कूं." मॊसी यूं आँखें घुमाई, मानो मेरे सम्मुख किसी रहस्य का उदघाटन किया हो. वो बोलती जा रही थी," पन देख लाली, हमारी सीला कू. मजाल, बिना काम नेक भी घर से बाहर रहती हो. बस, घर से कालेज ऒर कालेज से घर. गर में भी वा भली, वाको कमरो भलो. बंद करके पढाई करती रहे. एक इन लडकिन कूं देख, कैसो बेसरमपनो उठा रखो है? मान- मर्यादा कछु है ही नाय. "
" हाँ, मॊसी." मैं ऒर क्या कहती?
" मैं तो कहूँ, या में इन्के घर वारन की भी गलती है. उनकी आँख फ़ूट जायें हैं क्या, पतो ही ना? तुम्हारे अंकल ने तो या मारे ही सीला कू कोई लूना-वूना नय दिलाई. छोरिन के पास लूना हो तो, घूमती फ़िरैं इत-उत कू.तेरे अंकल ने साफ़ कह दी, बस से आओ- बस से जाओ. ठीक है ना, लाली. बस में आए जाए तो टेम से आ जाए चली जाए. अब या लडकिन कूं ही देख, मरी कैसी लदी जा रही छोरा पर. छोरन को का जाए?खा-पीकर,मुँह पूंछ कर चल देवें. लडकी जात की तो लाज चली जाये, तो का बचे फ़िर? बोल."
" सही बात है मॊसी. जमान ही एसा है. लडके लडकियाँ कहाँ सुनते हैं किसी की?"
" ये बात ना है लाली. सुनते क्यूं ना हैं? हमारी सीला सुनै है कि ना? घर वालन को कंटरोल होनो चाहिए, बस. छोरिन कूं क्यूं इत्ती आजादी देवें कि नाक कटाती डोलें बजार में. तुम्हारे अंकल तो सख्त खिलाफ़ हैं, इन सब के."
(क्रमश:)
Subscribe to:
Post Comments (Atom)



1 comment:
कहानी बहुत जबरदस्त थी। संजय जी आप जैसे लेखकों कि बुनो कहानी को जरूरत है। क्या आप भाग लेना चाहेंगे? देबू और जीतेंद्र आपके जवाब से उछल पड़ेंगे ऐसा विश्वास है।
Post a Comment