Tuesday, August 09, 2005

एक गजल

जुगनू लेकर अडा हुआ हूँ
रात के आगे खडा हुआ हूँ.

ठोकर खा-खा कर सीखा है,
एसे ही तो बडा हुआ हूँ.
सबकी प्यास बुझाई मैंने,
जाम-सा टूटा पडा हुआ हूँ.

बाहर बाहर फ़ूल-सा कोमल,
भीतर भीतर कडा हुआ हूँ.

फ़ांस बना हूँ, दुनिया भर की-
दो आँखों में गडा हुआ हूँ.

-संजय विद्रोही

2 comments:

अनूप शुक्ल said...

बढ़िया लिखा है।

अनुनाद सिंह said...

अति सुन्दर ! पर ये " दो आँखे " कौन हैं ?