जुगनू लेकर अडा हुआ हूँ
रात के आगे खडा हुआ हूँ.
ठोकर खा-खा कर सीखा है,
एसे ही तो बडा हुआ हूँ.
सबकी प्यास बुझाई मैंने,
जाम-सा टूटा पडा हुआ हूँ.
बाहर बाहर फ़ूल-सा कोमल,
भीतर भीतर कडा हुआ हूँ.
फ़ांस बना हूँ, दुनिया भर की-
दो आँखों में गडा हुआ हूँ.
-संजय विद्रोही



2 comments:
बढ़िया लिखा है।
अति सुन्दर ! पर ये " दो आँखे " कौन हैं ?
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