Monday, August 29, 2005

दो गजलें....

(१)

उसको गर अब उडान दे मालिक,

तो नया आसमान दे मालिक.

जिसमें घर का सुकून मिलता हो,

मुझको एसा मकान दे मालिक.

अपनी बातों से आग ना बरसे,

हमको मीठी जुबान दे मालिक.

आ के मजहब की बात में निसदिन,

कोई क्यूँ अपनी जान दे मालिक.

प्यार बच्चों को बाँटने दीजे,

मजहबों का ना ग्यान दे मालिक.

सारी अजमाईशें मेरी ही क्यों?

वो भी तो इम्तिहान दे मालिक.

(२)

जितनी तेज दुपहरी होगी,

छाया उतनी गहरी होगी.

दुआ ना आ पाई मुझ तक क्यूँ?

कहीं राह में ठहरी होगी.

बाई ने ही पाला होगा,

बच्चे की माँ शहरी होगी.

झूठे लोग- मुकदमे झूठे,

पर खामोश कचहरी होगी.

तन्हाई रोशन है जिससे,

कोई याद सुनहरी होगी.

जिसने दिल की बात ना समझी,

दुनिया गूँगी-बहरी होगी.

-संजय विद्रोही

3 comments:

Sarika Saxena said...

दोनो ही गज़लें बहुत खूबसूरत हैं।

Sarika Saxena said...

दोनो ही गज़लें बहुत खूबसूरत हैं।

Anonymous said...

Sanjay Tumhari har Gazal ati sunder v bhav poorn hai. kafia v radeef bhi manbhavak. Bahut aha likhte ho. Mubarakho