सपना मुझ में अटक रहा है,
सबके दिल में खटक रहा है.
मयखाने में झुका है सावन,
साकी जुल्फ़ें झटक रहा है.
पहलू में तुझ बिना कहीं पर,
शीशा कोई चटख रहा है.
यारों वक्त दुधारा खंजर,
सबके सिर पर लटक रहा है.
कैसी उसकी हुई इबादत?
पत्थर पर सिर पटक रहा है.
मन मेरा म्रग बना हुआ है,
जो सहरा में भटक रहा है.
पलकों में वो कहीं अकेला,
सच्चे मोती फ़टक रहा है.
-संजय विद्रोही
Wednesday, August 24, 2005
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