Wednesday, August 24, 2005

स्कार्फ़-३

स्कार्फ़-३
गतांक से आगे.....घर आने ही वाला था. तीन बज चुके थे. मैंने सोचा, आज रात मम्मी के पास ही रुक जाती हूँ. 'वो' इन्तजार ना करें, सो तुरन्त मोबाईल मिलाया.
"हैलो! मैं बोल रही हूँ.......एसा है आज मैं मम्मी के यहाँ ही रुक जाती हूँ, आप कहें तो."
"ठीक है, मुझे भी आफ़िस में आज देर हो जाएगी."
"खाने का?"
"आफ़िस में ही कुछ मँगवा लूँगा, चिन्ता मत करना. ओके." कहकर 'उन्होंने' फ़ोन बंद कर दिया. थोडी ही देर में घर आ गया. हमारा घर गली में मुडते ही ऒर नुक्कड से ही नजर आता है जबकि मॊसी का घर थोडा अन्दर चलके है, जो कि नुक्कड से नजर नहीं आता है.
....मम्मी के घर में शाम हमारी छत पर ही गुजरती है. मेरी शादी से पहले भी ऒर आज भी. वहीं चाय बनाकर दे जाती है भाभी. बच्चे भी वहीं धमाचॊकडी मचाते रह्ते हैं. मम्मी- पापा भी वहीं बैठे बतियाते रहते हैं. मम्मी उन्हें दिनभर के समाचार देती रहती है ऒर वो जवाब में " हाँ-हुँ" करते-करते अपना अखबार पढते रहते हैं. आज भी एसा ही हुआ. भाभी चाय दे गई, सब व्यस्त हो गए. मैं छत पर घूम-घूम कर चाय पीने लगी. मेरी पुरानी आदत है.
अचानक मैंने देखा कि दूर नुक्क्ड से थोडा पहले ही एक मोटर बाईक आकर रुकी . 'अरे! ये तो वो ही लडका-लडकी हैं सुबह वाले' बरबस ही मेरे मुँह से निकल पडा ऒर उत्सुकतावश मैं खडी होकर दिवार की ओट से उनको देखने लगी.लडकी ने उतर कर लडके को "बाय" किया ऒर लडका हाथ हिलाता हुआ चला गया. इसके बाद लडकी ने इधर-उध्र देखते हुए अप न स्कार्फ़ खोला ऒर तहाकर उसे पर्स के सुपुर्द किया. अब वो जरा नार्मल लग रही थी , किन्तु अभी भी उसका मुँह दूसरी तरफ़ ही था.फ़िर उसने हथों से अपने बालों को ठीक किया ऒर संयमित कदमों से गली की तरफ़ घूमी."शीला!!?" मैं एकदम चॊंक पडी.(समाप्त)

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