मुश्किलों से भरी है डगर देखिए
वक्त से दुश्मनी का असर देखिए.
याद में रात भर जिसकी जागेंगे हम
सो रहा है यहाँ बेखबर देखिए.
दर्द पलकों के नीचे मचलने लगा
इस नदी में उठी जो लहर देखिए.
कॊन जाने कि कल हम रहें ना रहें
आज हैं, तो जरा-सा इधर देखिए.
होश की बात करते रहे उम्र भर.
वो ही बेहोश हैं, इक नजर देखिए.
Tuesday, August 23, 2005
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1 comment:
विद्रोही जी, बहुत ही अच्छ लिखते हैं आप! सच तो यह है कि एक ज़माने में मैं भी कविता घज़ल लिखता था , और मेरे और आपके शेरों में काफी समानतायें भी हैं।
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