
झिलमिलाती हुई निगाहों से,
रात भर झांकता रहा कोई
नींद के आसपास तकिए पर
याद एक टहलती रही कोई
ख्वाब एक, मेरे सिरहाने रख कर
एक नाजुक-सा मुलायम अंधस
जब चमक जाता है निगाहों में
दूर तक दीखता है लोगों को
रतजगे करती हैं रातों, रातें
ऒर सितारे भी मुस्कुराते हैं
चीख उठती हैं हवाएँ अक्सर
पेड सरगोशियाँ सुनाते हैं
चाँद भी घूरता रहता है हमें.....
एक अँधेरा सजा के बैठा हूँ
अपने दिन ऒर अपनी रातों में
तेरी सूरत को रचा रखा है
मैंने काजल की तरह आँखों में....
-संजय विद्रोही



3 comments:
वाह भाई वाह ! आपकी कविता सचमुच बहुत अच्छी है । शब्द-योजना अतीव सौन्दर्यपूर्ण है ।
हिन्दी चिट्ठाजगत में हार्दिक स्वागत है ...
अनुनाद
अनुनाद जी,
आप्के उत्साहवर्धन के लिए दिल से आभारी हूँ...स्नेह बनाए रखें..
-संजय विद्रोही
नींद के आसपास तकिए पर
याद एक टहलती रही कोई
बहुत अच्छी लगीं आपकी ये पंक्तियाँ......
प्रत्यक्षा
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